उत्तराखंड में आज के दिन मनाया जाता है इगास बग्वाल (बूढ़ी दीपावली) का त्यौहार, जानिए इस त्यौहार को मनाये जाने का कारण

बहुत लोगों ने इस पहाड़ी त्योहार का नाम शायद ज्यादा न सुना हो। ये वो त्योहार है, जो कामकाज की तलाश में पहाड़ों से शहरों को पलायन कर जाने वाली पीढ़ी ने अपने बचपन में जम कर मनाया होगा। उन्होंने इगास बग्वाल पर खूब स्वालें-पकोड़े खाकर रात में पूजा पाठ के बाद जलता हुआ भैला, मसका बाजे और ढोल-दमऊ की थाप पर आग के चारों ओर जम कर डांस किया होगा।

ये एक प्रसिद्ध उत्तराखंड के गढ़वाल और कुमाऊँ में मनाया जाने वाला त्यौहार है। समय के साथ-साथ शहरों में बस गए पहाड़ियों की नयी पीढ़ियां अब बग्वाल नहीं दीपावली मनाती हैं और इगास बग्वाल पारम्परिक पहाड़ी त्योहारों की तरह अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। भला हो सोशल मीडिया और फेसबुक, व्हाट्स ऍप ग्रुपों का जो अब लोग अपनी परंपरा और सांस्कृतिक विरासतों के बारे में जानकारी बांटने लगे हैं।

जो शहर में पैदा होने वाले अपने परिवार की पहली पीढ़ी है, वो अगर अपने माता पिता या घर के बुजुर्गों से पूछें तो उनके चेहरे पर यकीनन आप अपनी संस्कृति, विरासत के बारे में सुनकर मिलने वाले सुकून से भरी मुस्कान पाएंगे।

इगास बग्वाल की पौराणिक कथा

गढ़वाली में दीपावली को बग्वाल कहा जाता है। जब भगवान राम 14 वर्ष बाद लंका विजय कर अयोध्या पहुंचे तो लोगों ने दिये जलाकर उनका स्वागत किया और तबसे इसे दीपावली के रूप में मनाया जाता है। कहा जाता है कि गढ़वाल क्षेत्र में लोगों को इसकी जानकारी 11 दिन बाद मिली। इसलिए यहां पर दीपावली के ठीक 11 दिन बाद एकादशी के दिन यह दीपावली मनाई जाती है। इसलिए इसे कुमाऊँ में बूढ़ी दीपावली और गढ़वाल में इगास बग्वाल कहा जाता है।

इगास बग्वाल एक और लोक कथा

तो ये तो थी इगास बग्वाल की पौराणिक कथा। गढ़वाल में इसे लेकर एक और लोक कथा है। लगभग 400 साल पहले टिहरी के राजा महीपति शाहराजा ने वीर माधो सिंह भंडारी को सेनापति बनाकर तिब्बत से युद्ध करने के लिए भेजा। इसी बीच बग्वाल (दीपावली) का त्यौहार भी था, मबगार युद्ध खत्म न हुआ और कोई भी सैनिक दीपावली पर घर वापिस ना आ सका। सबने सोचा माधो सिंह और उनके सैनिक युद्ध में शहीद हो गए, इसलिए किसी ने भी दीपावली नहीं मना।  मगर दीपावली के ठीक 11वें दिन माधो सिंह भंडारी अपने सैनिकों के साथ तिब्बत से युद्ध जीत वापिस लौट आए। उस दिन एकादशी थी और पूरे गढ़वाल में तब दीपावली मनाई गयी थी। उस दिन एकादशी होने के कारण इस पर्व को इगास बग्वाल का नाम दिया गया।

इगास में रात को लोग गाँव में एक जगह इकठ्ठे होकर भैलो खेलते। भैलो पेड़ की छाल से बनी एक रस्सी को कहते है। लोग रस्सी के दोनों कोनों में आग लगा देते हैं और फिर रस्सी को घुमाते हुए भैलो खेलते हैं। आग के चारों और मसका बाजा, ढोल दमऊ पर लोक गीतों पर नाचते गाते हैं। पहाड़ी संस्कृति में ये त्योहार बहुत अहम् हिस्सा रखता है। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम चाहे देश परदेस जहाँ भी रहें मगर अपने पारम्परिक त्योहार और रीति रिवाजों का ज्ञान अगली पीढ़ी को जरूर दें।  हमारी संस्कृति ही हमारी सच्ची पहचान है।

वीडियो सौजन्य से: वैष्णवी प्रोडक्शन हाउस

– ओमी उमेश भट्ट, सूर्याटाइम्स

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